( भावनात्मक कथा )
एक प्यार ऐसा भी ..........
(मौलिक कहानी)
आज दीया बहुत खुश है क्यूंकी आज उसकी मेहनत रंग लाई है|उसका बरसो का सपना जो सच हो रहा था |तो आख़िरकार उससे अपनी मंज़िल मिल ही गयी| उससे साहित्या केसर्वोच्य पुरस्कार के लिए चुना गया था |और कल उसे वो पुरस्कार मिलने वाला है जिसे पाके हर साहित्यकार,लेखक ओर कवि स्वयं को गौरवशाली ओर सम्मानित महसूसकरते है|
इस खुशी के समाचार को पाते ही उसके प्रशंसक ,रिश्तेदार,परिवार व मित्र आदि सभी बधाईयाँ दे रहे थे और उसकी आंखों में खुशी के आँसू थे| इसके अतिरिक्त पत्र -पत्रिकायों के रिपोर्टर न्यूज़ चेनल के (मीडीया) संवाददाता इत्यादि सभी उसकी उपलब्धियों की कहानी सुनना चाह रहे थे ओर उसी की ज़ुबानी बाकी समाज में ओर भी लोगों को प्रेरणामिल सके| और ये भी जानना चाह रहे थे की इस सारी सफलता के पीछे किसका हाथ है? किसी ने पूछा "कौन है आपकी प्रेरणा" | उनका इशारा उसके किसी मित्र रिश्तेदार वपरिवार के किसी सदस्य की ओर था |उन्होने भी यही सोचा की शायद हमारा नाम लिया जाएगा| मगर उसने किसी का नाम नही लिया| उसने मात्र इतना कहा "कोई नही! सिर्फ़ईश्वर ही मेरी प्रेरणा है"|उसके इस जवाब से सब चुप हो गये| पत्रकार ,संवाददाता ओर उसके मित्र रिश्तेदार परिवार वाले सभी | कोई कहता भी क्या ईश्वर ही तो सहारा होता हउनका जिनका कोई नही होता| ये सभी मानते है|
दीया कुछ भी नही भूली थी| उसकी वह निर्मम घुटती तनहाईयाँ ,रिश्तेदारों के उपहास ,अपनो के कटाक्ष ,अपमान और उपेक्षाएं आदि|इन सबको उसने ज़हर के रूप में अपनेगले से उतार लिया था |जिससे कभी कभी प्यास सी जगी रहती जो कभी पानी से या किसी अन्य तरल पदार्थ से तो क्या बूझती !और जिससे बुझ सकती थी वो अमृत तो कभीमिलना ही नही था |जिस्से प्यार कहते है|रेगिस्तान रूपी संसार में प्यार के झरने की उमीद हा हा !हाँ मगर आँखों में आँसुओं की कमी नहीं , जितना चाहो पी लो |कभी कभीतो डर लगता था ,कहीं ये अंतिम सहारा भी ना छूट जये|जब कभी ये सूखने से लगते थे तो अपने आप से पूछती थी अब क्या पियूं? क्याअपना लहू . सबके बीच रहके भीपरायापन,सोचती थी की हम जन्म ही क्यूँ लेतहैं इस संसार मेअगर ये ऐसा ही है दुखों से भरा हुआ तो | इस संसार में है क्या! बेवफा है ज़िंदगी जो इतना दुख ,कष्ट ,संताप सेसामना करवाती है| मगर क्या करें ? मरना कौन सा आसान है| हालाँकि दीया ने ख़ुदकुशी का भी प्रयास किया मगर नाकाम रही| अब ये तो ओर भी मुश्किल हो गई येकैसी बेबसी है| क्या मजबूरी है| ज़िंदगी भी बेवफा ओर मौत संगदिल|हे भगवान! तू ही सुन ले; ये पुकार वो बार बार ईश्वर से करती |दीया जितनी बार हताश होती उससे मुक्ति कीकामना करती , उतनी ही बार एक मधुर जादू भारी आवाज़ उससे रोक देती और उठ के चलने के लिए प्रेरित करती थी | यही वो जिंदादिल आवाज़ थी जिसने उसके अंदरउम्मीद की लो जलाए रखी | उसे कभी बुझने नही दिया|
फिर अपने ख़यालों से निकल कर दीया अपने कमरे में आ गयी और अपने दोस्त की तस्वीर के सामने खड़े होकर उसको प्रणाम किया औरशुक्रिया अदा किय|इस्के उपरांतहमेशा की तरह अपनी अलमारी से डायरी निकालकर आराम कुर्सी पे बैठ कर कुछ लिखने बैठ गयी | शायद कोई पत्र .ये डाइयरी क्या थी ,उसके पत्रों का संग्रह थी वो पत्र जोकभी पोस्ट ही नही किए गये|पोस्ट करती भी तो किसे ! क्यूंकी इससे पाने वाला और पढनेवाला और पड़कर जवाब देने वाला कब से चीर्यात्रा पर जा चुका था| किसी ' दूर केमुसाफिर के लिए लिखे गये खतों का अंजाम और क्या हो सकता है भला| मगर फिर भी वो लिखती थी सिर्फ़ अपने दिल की तस्सली के लिए , अपने रूह की तशनगीके लिए|आज जो खुशी उससे मिली है उसका ज़िक्र करना भी तो ज़रूरी था अतः उसने पुनः एक पत्र लिखा |----------------
ए मेरे प्यारे मित्र,
प्रणाम
इस नाचीज़ को तुम नहीं जानते मगर तुम्हारे चाहने वालो में हम भी एक है| तुम्हारी अद्वित्य और अमर शमा का परवाना तुम हमें कह सकते हो| एक अदना सा परवाना|जिसने अंजाने में तुमसे एक अनोखा रिश्ता जोड़ लिया | एक अनदेखा और अंजाना मगर एकदम पाकीज़ा जिससे दुनिया नहीं समझ सकी और परिवार भी ना समझ पाया|लेकिन मैने सदा महसूस किया| हाँ सच !मैने तुम्हे अपने मन और आत्मा में महसूस किया है| तुम जीवित नहीं हो| इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्यूंकी मेरे लिएतुम मौजूद हो| इस पूरी कायनात में तुम मौजूद हो| पंछीयों के स्वर में ,हवा के झोकोन में ,फूलों की खुश्बू में , नन्हे बच्चों की किल्कारियों में ,सब इंसानों के दुख सुख में औरमेरी आहों में , मेरे दर्द में भी तुम मौजूद रहे| जिससे मैने पल पल महसूस किया | इतना की तुम मेरे करीब होते गये और ये दुनिया के रिश्ते सब दूर होते गये| हमारे पाक रिश्तेके समक्ष जो की निस्वार्थ था | मुझे बाकी सारे रिश्ते झूठे बनावटी और स्वार्थी लगते थे|
पिता का साया जब सर से उठा तो सारी दुनिया पराई लगने लगी | ज़माने भर के ग़मों ने आ घेरा ,मुझे अपनो ने ही अकेला छोड़ दिया| रिश्तेदारो की असलियत सामने आई तोदिल टूट सा गय,ज़िंदगी के संघर्ष भी अकेले ही झेले| चाहे शादी का मसला हो या नौकरी क|खुद ही सारे हाथ पावं मारने पड़े | भाईओ का सहयोग तो नाम मात्र का होता था, मा ने लेकिन अपनी तरफ से बड़ी कोशिशे की| हर तरफ नाकामी झेलते झेलते माँ टूट गयी और भी हार गयी| ऐसे में तुमने मेरे लिए वो सब कुछ किया जो एक सॅचा दोस्तही एक दोस्त के लिए करता है|
ज़िंदगी के सफ़र में जब भी मैं लड़खड़ाई , डगमगाई तो तुमने मुझे अपने जोशीले गीतो से पुनः संभाल कर चलने के लिए प्रेरित किया | मुझे तुमसे वो प्यार मिला जो किसी भीतरह के रिश्तो में नहीं मिला| इसीलिए कभी कभी मेरा दिल बहुत बेकरार सा हो जाता था| कोई शकल सूरत , कोई नज़र, कोई हाव भाव या कोई भी व्यवहार ऐसा किसी भीव्यक्तित्व में नज़र नहीं आता था| जो था वो सब बनावटी| मगर तुम्हारी पूरी शक्सियत में प्यार समाया हुआ था| यूँ लगता है जैसे तुम्हारा जन्म ही इसलिए हुआ की तुम सारेसंसार में प्यार ओर संगीत की बरसात करो| ओर सब के तनमन उसमे भीग जाएँ| जिससे सारी मलिनता धूल जाए|
वो असर तुम्हारे जाने के बाद भी बना हुआ है और रहती दुनिया तक रहेगा | तभी तो थोड़ी बहुत नामी बाकी है जहाँ में , इसी के सहारे तो जी रहे है हम जैसे प्यार के प्यासे ,रूहानी प्यार के | ह्में भौतिकता नहीं भाँति | हमें तो रूहाणियत या इशके हकीकी ही भाती है| संगीत में ईश्वर जो बस्ता है| मगर फिर भी नज़रें तो तुम्हे ही ढूंडती रहती थी| तुम्हारीनज़दीकियाँ पाने की चाहत होती थी कि आपस में कुछ बातें करें कुछ अपनी सुनायें तथा कुछ तुम्हारी सुनने| तुम्हे वो गीत , ग़ज़ल , शायरी सुनायें जो की मैने तुम्हारे प्रेम मेंही प्रेरित होकर लिखनी शुरू करी| तुम्हारे कारण हाँ! तुम्हारे ही कारण ही मैं शायर बनी | मेरे ये गीत , ग़ज़ल , भजन आदि तुम्हारी आवाज़ में ढलने को अब तरस रहे है| इन्हेभी तुम्हारा इंतेज़ार है और मुझे भी|
"हर एक गाम पर तुम्हे ढूँढते हुए
हम अपनी जान से गुज़र गये|
मगर इस जिस्त को तुम्हारे कुचे का
पता फिर भी ना मिला|"
मैं तुम्हारे प्रेम में शायरा तो बन गयी और इसी प्रेम ने मुझे इस सर्वोच्य शिखर पर खड़ा कर दिया| मैं यहाँ आज जिस मुकाम पर आकर खड़ी हूँ तुम्ही तो लेकर आए मुझे यहाँ ;तुमने ही तो दिखाई मुझे ये ड्गर | अब देखो ज़माना कहाँ खड़ा है और मई ख़ान खड़ी हूँ| सभी अपने पराए अब एक हो गये हैं| यही वो मंज़िल है जिसकी मुझे बरसो से तलाश थीऔर यही वो मंज़िल तुमने मुझे दिलवाई| अब खुदा भी मेरे साथ है और तकदीर भी| और इसीलिए अब अपने भी मेरे साथ हैं|
इन सारी सफलताओं का श्रेय तुम्हे जाता है| तुम ही हो मेरीप्रेरणा .ईश्वर केभेजे हुए तुम फरिश्ते हो मेरी ज़िंदगी के|
बस अब एक ही तमन्ना है मेरी आख़िरी , और वो है तुम्हारा दीदार | तुमसे एक छोटी सी मुलाकात , फिर चाहे मुझे इसके लिए कयामत तक का इंतेज़ार करना पड़े तो मैंकरूँगी , बेशक करूँगी|
और अंत में अब इस दुआ के साथ पत्र समाप्त करती हूँ की ख़ुदा तुम्हे जन्नत बक्शे और तुम्हारीरूह को तसल्ली दे|
आमिन तुम्हारी दीया