रविवार, 14 जून 2015

MAINTENANCE ( भरपाई ) लघु-कथा

                         लघु-कथा 
                      MAINTENANCE  
                      (  भरपाई ) 
 ‘’ बस  अब  बहुत  हो चूका ,  अब मुझसे  और  बर्दाश्त   नहीं होता . तुम सबने  मुझे
   समझ  क्या रखा है ? हैं !  क्या मैं  कामवाली बाई  हूँ , क्या  मैं  कोई सेवादारनी हूँ?
   क्या मैं   तुम  सब की  आज्ञा पालन करने वाली  तुम्हारी गुलाम हूँ. ? तुम सब ने मुझे
   गूंगी  गुडिया  बना रखा  अब तक . चाहे तुम सब जितना भी ज़हर उगलो, गालियाँ दो ,
   ताने मारो ,मुझे  और मेरे मायके वालों को . और उस पर मुझ पर पाबंदियां लगाओ ,
   तो और मैं सब  बर्दाश्त करती रहूंगी,  क्यों ? तो सुनो मिस्टर ! अब यह सब नहीं होगा
   निशा के गुस्से से तमतमाए चेहरे और तीखी व् बुलंद आवाज़ ने सब के होश उड़ा दिए.
   धरती  की तरह चुप-चाप सब अत्याचार ,पक्षपात , षड्यंत्र , और  पाखंड  सहने वाली
   नारी के  भीतर  से  यह ज्वालामुखी  एक दिन फटना ही था ,सो आज फट गया.
       निशा  आवेश  मे अपने  कमरे में गयी और  अपने सूटकेस में अपने कपड़े ,गहने और कुछ ज़रूरी सामान पैक करके घर से बाहर  निकल आई . उसका पति रमेश उसके पीछे जल्दी-जल्दी उसे रोकने को आगे बढ़ा  तो उसने  हाथ बढाकर इशारा किया ,’’ वही रुक जाओ रमेश !  अब तुम मुझे  रोकने ,मनाने  का हक खो चुके हो .अब कोई फायदा नहीं. तीर कमान से छुट चुका है अब वापिस तो आने से रहा. अब मुलाक़ात अदालत में होगी.’’ (  गेट के पास पहुंचकर वापिस मुड़कर रमेश की ओर मुखातिब  होते हुए ) ‘’ और  हाँ मेरी MAINTENANCE ready रखना ,पुरे ५० लाख समझे ! ‘’
 ‘’५० लाख ! ‘’ रमेश  के हाथों  के तोते उड़ गए.
‘’ हाँजी !  और क्यों नहीं !  जो कुछ मैने  इस घर में खोया है , वोह  क्या वापिस नहीं लूगी.
  इतनी  आसानी से  छोड़ दूंगी क्या ! मेरी  उच्च शिक्षा क्या चूल्हे में झोकने के  लिए थी दर्द,
  संताप, घुटन, अपमान और उपेक्षा ,जो मुझे तुमसे और तुम्हारे परिवार वालों से मिला .यह सब
  की भरपाई यानि MAINTENANCE  तो लेना बनता है ना.!.जब  से हमारी शादी हुई  तुम 
 मुझे  बस मेरे  फ़र्ज़  याद करवाते रहे , मेरे  हकों   की बात  कभी  की ही नहीं , मगर अब
इस घर से  अपना आखिरी  हक तो लेकर ही रहूंगी. समझे!
 

    

      

शनिवार, 13 जून 2015

लघु-कथा - कबाड़

                             लघु –कथा  -२
                               कबाड़
         ज्योति  कबाड़ी वाले  को  बुलाकर अपने घर  का सारा  पुराना टुटा-फूटा, सामान
         निकाल कर दे रही थी ,बेचने को . जैसे टूटी हुई चारपाई, कुर्सी, मेज ,आईना ,
         जंग  खाए हुए  स्टील  के बर्तन, लाठी ,  और रद्दी  में पुराने अखबार, पत्रिकाएं,
         पुस्तकें. आदि. जब सब  वस्तुएं एकत्र हो गयी तो ज्योति ने कबाड़ी वाले को सबका
          हिसाब करने को कहा . लगभग १ घंटा  बहस चलती रही . इतने  में ज्योति का
          बेटा अंकुश स्कूल से  आया और  घर की  चौखट के बाहर  बिखरे हुए सब सामान को 
          देखा  तो  पूछ  बैठा ,’’ क्या कर रही हो मम्मा ?’’
          ‘’कुछ कबाड़ बेच रही  हूँ बेटा, ‘’
         ‘’ क्या  देख रहे हो ,तुम्हारे मतलब का इसमें कुछ  नहीं है ,तुम जाओ अन्दर
         और डाइनिंग  टेबल  पर रखा है जूस का गिलास ,उसे पी  जाओ ,और अपनी
        यूनिफार्म  भी बदल लो , जाओ!’’
          माँ  के आग्रह को अनसुना करके अंकुश फिर भी उस  कबाड़ से जाने क्या
         तलाश कर रहा था. आखिरकार  इतना तलाश करने पर  उसे  अपने
          प्यारे दादाजी  का  टूटा हुआ चश्मा ,बर्तन (जिसमें  उन्हें खाना दिया जाता  था,)
        उनका कई जगह से मुदा –तुड़ा स्टील  का गिलास ,और लाठी आदि मिल गयी .
        और उठाकर वोह अन्दर ले जाने लगा तो ज्योति ने उसे रोक लिया.
      ‘’ इसका तुम क्या करोगे ? यह तुम्हारे दादाजी का था. .अब इन् चीजों की 
       कोई ज़रूरत छोडो इसे ‘’
     ‘’ ज़रूरत है मम्मा ! कैसे  ज़रूरत नहीं.?. जब  मैं  बढ़ा हो जायूँगा  और आप बूढ़े हो             जाओगे  तो आपको और पापा को  इसी  में खाना  खिलाया  करूँगा , इसी गिलास में
     पानी दूंगा ,जिसमें आपने दादाजी को दिया और आपको भी इस लाठी की ,इस चश्में की                 ज़रूरत पड़ने  वाली है. है ना !
       अंकुश  अपने प्यारे  मरहूम  दादाजी का  सामान लेकर घर  के अन्दर चला गया
      और ज्योति को अपने  बुरे कर्मो का भांडा सारे मोहल्ले वालों के सामने फूटने  की
       वजह से  कबाड़ी वाले और पड़ोसियों  सामने शर्मिन्दा होना पडा .