आवाज़ एक, भाव अनेक ...... ( अमर गायक स्व। मोहम्मद रफी साहब के जनांदिन पर विशेष एक लेख )
तुम मुझे यूं भुला न पायोगे ,
जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे ,
संग -संग तुम भी गुनगुनाओगे ।
हमारे हर दिल अज़ीज़ और अमर गायक मोहम्मद रफी साहब ने बिलकुल सही फरमाया ।
यह गीत के बोल उनपर शत-प्रतिशत सार्थक हो गए ,उनके जाने के बाद । और वास्तव में हम उनको कहाँ भूल
पाये हैं अब तक ,और ना ही कभी भूल पाएंगे । उनको हमसे बिछड़े ३९ वर्ष गुज़र गए । अगर तक़दीर वफा करती,अगर खुदा की भी इनायत होती तो वो हमारे बीच गर होते तो ९५ वर्ष के होते । मगर कुदरत को यह कहाँ मंजूर था! हमसे जुदा करके ले गयी दूर ,बहुत दूर । अब होनी पर किसका बस चलता है!
मगार हमारी यादों में, और दिलों में वो सदा जीवित रहेंगे यह तो बिलकुल सच है । और जब तक यह धरती है, कायनात है ,आसमान पर चमकते चाँद -सितारे हैं। वो हमारे दिल में सदा रहेंगे ,हमारी धड़कन बनकर । और क्यों ना हो उनकी आवाज़ हमारे लिए महज एक आवाज़ नहीं ,एक प्रकाश स्तम्भ है। एक अमृत है, जिजीविषा है, होंसला है और ताकत है। उनकी आवाज़ न केवल हमें दुख-सुख में बहलाती है बल्कि हमारे जीवन-संघर्षों से लड़कर पार पाने की प्रेरणा भी देती है और ताकत भी देती है। कुछ इस प्रकार से --
पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से ,
मुस्कुराओ तो कोई बात बनें ।
सर झुकाने से कुछ नहीं होगा ,
सर उठाओ तो कोई बात बनें।
या
माझी चल ,माझी चल ,
तू चले तो छ्म -छ्म बजे मोजों की पायल ....
इस प्रकार के बहुत से ऐसे गीतों का खजाना भरा पड़ा है जो वो हमारे लिए छोड़ गए हैं जो हमारे लिए अमूल्य निधि से कम नहीं है।उनके गीत हमारे लिए अमूल्य निधि इसीलिए भी है क्योंकि उन्होने हर उम्र, हर स्वभाव ,हर अवसर , हर भावों को अपना एक अलग अंदाज़ दिया। एक इंसान के हर जज़्बात के पहलू को उन्होने छूया है। मुहोबत,मिलन ,जुदाई ,नफरत, स्नेह, , ईर्षा , ,देशभक्ति इत्यादि ।
यहाँ सर्वप्रथम इंसान के सबसे नाज़ुक जज़्बात ''मुहोबत'' की चर्चा करेंगे ।
प्रेमिका के रूप की तारीफ --१, हुस्न से चाँद भी शरमाया है ,तेरी सूरत ने गजब ढाया है।
२ , हुस्नवाले ! तेरा जवाब नहीं ,
कोई तुझसा नहीं हजारों में ....
प्रेमिका से मीठी ,प्रेम भरी शिकायत --- ऐ नरगिसे मस्ताना ! बस इतनी शिकायत है ,
समझा हमें बेगाना ,बस इतनी शिकायत है ।
प्रेमिका से एक मुलाक़ात की याचना -- १,मेरे महबूब तुझे मेरी मुहोबत की की कसम ।
फिर मुझे नरगिसी आँखों का सहारा दे दे.....
२, आजकल शौक-ऐ- दीदार है , क्या कहूँ आपसे प्यार है,
प्रेमिका से नोक-झोंक -- तेरे हुस्न की क्या तारीफ करूँ ,
कुछ कहते हुए भी डरता हूँ ,
कहीं भूल से तू न समझ बैठे ,
के मै तुझसे मुहोबत करता हूँ ।
क्या ऐसे गीतों को सुंका यह एहसास नहीं होता की जैसे रफी साहब उक्त प्रेमिका के साथ अभिनेता नहीं वो खुद अपने प्रेम का इज़हार कर रहे हो । गायकी में अपने अभिनय की छाप छोडकर किसी प्रेमपूर्ण दृश्य को साकार करना कोई इनसे सीखे । किसी अभिनेता की छ्वी को अपनी आँखों में बसाकर उसी प्रकार प्रणय गीत को गाना , और हर अंदाज़ पर अपने स्वरों को भी उतार-चढ़ाव देना , आवाज़ बदलना इनब में इन्हें महारत हासिल थी।
और केवल प्रणय गीत ही ही नहीं जुदाई का गम भी उन्होने बड़ी संजीदगी से पेश किया ।
के सुनकर जिसे दिल ज़ार-ज़ार रो पड़ता है। इंसान का जीवन है तो दुख -सुख भी उसके साथ जुड़े रहते हैं।
ऐसे में प्रेम की सही परीक्षा होती है, इंसान के धीरज और होंसले की भी परीक्षा होती है। कोई संभाल जाए तो ठीक अन्यथा उम्र भर का विछोह सहना पड़ता है।
जुदाई चाहे कुछ समय की हो मगर बहुत तड़पाती है। यह पीड़ा जिस पर गुजरती है वही जानता है। और या कोमल ,संवेदनशील दिल रखने वाला इंसान ।जैसे की हमारे भावुक ह्रदय रफी साहब ।
१, मै चला जायुंगा दो अश्क बहा लूँ तो चलूँ ,
आखिरी गीत मुहोबत का सुना दूँ तो चलूँ ....
२, गम उठाने के लिए मै तो जिये जायुंगा ,
सांस की लय पे तेरा नाम लिए जायुंगा ...
प्रेमिका से मिली बेवफाई तो प्रेमिका से नफरत के भाव छ्लक उठे ,उसे ना जाने कितनी बददुआययेँ दे डालीं ।
१ , मेरे दुशमन तू मेरी दोस्ती को तरसे ,
मुझे गम देने वाले ,तू खुशी को तरसे ...
२, गुज़रें हैं आज इश्क़ में हम इस मुकाम से ,
नफरत सी हो गयी है मुहोबत के नाम से ....
या
यह दुनिया यह महफिल ,मेरे काम की नहीं -२
यह जुदाई ,यह नफरत, यह क्रोध, ईर्ष्या इत्यादि भाव रफी साहब ने अपनी भावपूर्ण आवाज़ से जीवंत कर दिये ।
अब चलो! प्रेमिका /प्रेमी से बेवफाई मिली , या प्रेम सफल भी हो गया तो भी ज़िंदगी सिर्फ यही पहलू तो नहीं है न । प्रेम करने के लिए दुनिया में और बहुत सी चीज़ें,है,कुदरत है, कुह अनमोल इंसानी रिश्ते हैं।
माता -पिता ,भाई-बहन ,दोस्त और बच्चे हैं।

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